Sunday, December 12, 2021

युवराज सिंह: सफेद बॉल से खेलने वाला भारत का सबसे बड़ा मैच विनर

नई दिल्लीकपिल देव ने एक बार कहा था कि इंडिया ने अबतक सिर्फ दो लेफ्ट हेंडर्स बैटर पैदा किए हैं। पहले सौरव गांगुली और दूसरे युवराज सिंह। आज युवराज सिंह का जन्मदिन है, जिन्हें बचपन में 'टॉर्चर' सहना पड़ता था। आज युवी के 40वें बर्थडे पर बताएंगे उनकी कहानी। कैसे छह गेंद में छह छक्के लगाए। टीम इंडिया को दो-दो वर्ल्ड कप दिलाए। जिन्होंने मैदान पर खून की उल्टियां की। कैंसर से जंग लड़ी। ये दास्तां शुरू होती है 12 दिसंबर 1981 से यानी आज से 40 साल पहले पंजाब-हरियाणा की संयुक्त राजधानी चंडीगढ़ से।

हाई बैक लिफ्ट और शानदार बैट फ्लो के साथ युवराज सिंह के शॉट्स किसी मुर्दा में भी जान फूंकने के लिए काफी थे। उनके लेट कट, पूल शॉट और स्ट्रेट ड्राइव का हर कोई दीवाना था।


युवराज सिंह: सफेद बॉल से खेलने वाला भारत का सबसे बड़ा मैच विनर

नई दिल्ली

कपिल देव ने एक बार कहा था कि इंडिया ने अबतक सिर्फ दो लेफ्ट हेंडर्स बैटर पैदा किए हैं। पहले सौरव गांगुली और दूसरे युवराज सिंह। आज युवराज सिंह का जन्मदिन है, जिन्हें बचपन में 'टॉर्चर' सहना पड़ता था। आज युवी के 40वें बर्थडे पर बताएंगे उनकी कहानी। कैसे छह गेंद में छह छक्के लगाए। टीम इंडिया को दो-दो वर्ल्ड कप दिलाए। जिन्होंने मैदान पर खून की उल्टियां की। कैंसर से जंग लड़ी। ये दास्तां शुरू होती है 12 दिसंबर 1981 से यानी आज से 40 साल पहले पंजाब-हरियाणा की संयुक्त राजधानी चंडीगढ़ से।



क्रिकेटर नहीं स्केटर बनना चाहते थे
क्रिकेटर नहीं स्केटर बनना चाहते थे

पिता योगराज सिंह खुद भारतीय टीम से खेल चुके थे। जब युवी पैदा हुए तब वो कोई मैच खेल रहे थे। उनतक खबर भिजवाई गई कि घर में लड़का हुआ है। योगराज भी यही चाहते थे कि जो सपना उन्होंने देखा था, उसे बेटा पूरा करे। यानी इंडियन क्रिकेट टीम का स्टार बने। हैरान करने वाली बात है कि युवराज कभी क्रिकेटर नहीं बनना चाहते थे, वो तो टेनिस खेलते थे। रोलर स्केटिंग करते थे।



​पिता की तपस्या का नतीजा है युवराज
​पिता की तपस्या का नतीजा है युवराज

युवी के पिता ने पूरी जिंदगी बेटे को क्रिकेटर बनने में लगा दी। घर पर ही प्रैक्टिस करवाते। जहां युवराज के सारे दोस्त मस्ती करते, उनके कजिंस फैमिल फंक्शन में धमाचौकड़ी मचाते तो वो प्रैक्टिस में लगे रहते। नन्हें युवराज को लगता कि उनके साथ टॉर्चर हो रहा है, लेकिन आज उनके रेकॉर्ड्स देखकर कोई भी कह सकता है कि बचपन की ये मेहनत बेकार नहीं गई।



​ऐसे शुरू हुआ सपनों का सफर
​ऐसे शुरू हुआ सपनों का सफर

युवराज के टैलेंट को देखते हुए 1995-96 में उनका चयन पंजाब की अंडर-16 टीम में हुआ। धीरे-धीरे जूनियर क्रिकेट में नाम चलने लगा। साल 2000 में उन्हें अंडर-19 वर्ल्ड कप में जगह मिली। प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट युवी के बूते ही भारत तब चैंपियन बना था। यहां से उनके सपनों का सफर शुरू हुआ। वो ख्वाब जिसे उनके डैडी ने खुली आंखों से देखा था। इसी साल उन्हें सीनियर टीम में मौका मिल गया। आईसीसी नॉकआउट ट्रॉफी में केन्या के खिलाफ डेब्यू किया। करीब सालभर टीम से अंदर-बाहर होने के बाद आया 2002 नेटवेस्ट ट्रॉफी का वो फाइनल जिसने युवराज को युवराज सिंह बना दिया।



​कंप्लीट ऑलराउंडर थे युवराज
​कंप्लीट ऑलराउंडर थे युवराज

2003 वर्ल्ड कप में शामिल किए गए युवराज सिंह ने टूर्नामेंट में दो अर्धशतक लगाए। जल्द ही टीम इंडिया उनके बिना अधूरी लगती। युवी का खेल लगातार सुधर रहा था। छह फीट एक इंच लंबे युवराज लोअर मिडिल ऑर्डर पर आकर बेहतरीन फिनिश करते। लंबे-लंबे छक्के लगाते। मौका पड़ने पर न सिर्फ पार्ट टाइम गेंदबाजी करते बल्कि विकेट भी निकालते, उनके पास शॉट्स की भरमार थी। फिल्डिंग में फिसड्डी टीम इंडिया को चीते से तेज एक फिल्डर मिल चुका था।



​छह गेंदों में छह छक्के
​छह गेंदों में छह छक्के

वक्त का पहिया घूमते हुए 2007 तक आ चुका था। 50 ओवर वर्ल्ड कप में शर्मनाक अंदाज में बाहर होने वाली टीम इंडिया के कई धुरंधरों ने इसी साल पहली बार होने जा रहे वर्ल्ड टी-20 में खेलने से इनकार कर दिया था। सीनियर्स की गैरमौजूदगी में युवराज को पूरा यकीन था कि कप्तानी उन्हें ही मिलेगी, लेकिन धोनी को मौका मिला। इंग्लैंड के खिलाफ उन्होंने न सिर्फ छह गेंदों में लगातार छह छक्के जड़कर इतिहास रचा बल्कि भारत को कप दिलाने में अहम भूमिका भी निभाई।



​अभी एक लड़ाई और लड़नी थी
​अभी एक लड़ाई और लड़नी थी

2011 में हुआ 50 ओवर का वर्ल्ड कप भी भारत जीता। यहां भी मैन ऑफ द टूर्नामेंट युवी ही थे। एक मैच के दौरान खून की उल्टियां करते वक्त किसी को नहीं पता था कि वह कैंसर से जूझ रहे हैं। तब ये जानलेवा बीमारी पहले स्टेज पर थी, उन्होंने विदेश जाकर इसका इलाज करवाया। बीमारी ने उन्हें अंदर से कमजोर कर दिया था। दुनिया ने सोच लिया था कि युवी कभी वापसी नहीं कर पाएंगे, लेकिन 2017 में तीन साल और 60 वनडे के बाद उन्होंने विराट की कप्तानी में मौका मिला। इंग्लैंड के खिलाफ कटक में उन्होंने 127 गेंदों में 150 रन बनाते हुए अपने करियर की सबसे बड़ी पारी खेल डाली।



​नम आंखों से कहा क्रिकेट को अलविदा
​नम आंखों से कहा क्रिकेट को अलविदा

अपनी उम्र और फिटनेस के चलते युवराज ने 19 जून 2019 को इंटरनेशनल क्रिकेट से संन्यास ले लिया। अपने 19 साल लंबे चमकीले करियर में युवी ने 304 वनडे, 40 टेस्ट और 58 टी-20 इंटरनेशनल खेले, जिसमें 11 हजार से ज्यादा रन बनाए। आईपीएल में किंग्स इलेवन पंजाब, सहारा पुणे वॉरियर्स, मुंबई इंडियंस, आरसीबी और सनराइजर्स हैदराबाद के लिए जलवे भी बिखेरे। एक सच्चाई ये भी है कि युवराज सिंह के टैलेंट के साथ बीसीसीआई ने न्याय नहीं किया। 2007 और 2011 के वर्ल्ड चैंपियन को 2015, 2019 में वर्ल्ड कप में नहीं खिलाया गया।





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